दिल्ली विश्वविद्यालय की सहायक प्रोफेसर देबोस्मिता पाल की हत्या के मामले में मुख्य आरोपी रामप्रसाद दास को लेकर हैरान करने वाले खुलासे हुए हैं। पुलिस जांच में सामने आया है कि वह केवल हत्यारा ही नहीं बल्कि करोड़ों रुपये की ठगी करने वाला शातिर अपराधी भी है। उसके घर से फर्जी पुलिस पहचान पत्र, नकली नोट, महंगी घड़ियां और अन्य संदिग्ध सामग्री बरामद हुई है। AI आधारित सीसीटीवी तकनीक ने इस सनसनीखेज हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने में अहम भूमिका निभाई।
दिल्ली विश्वविद्यालय की सहायक प्रोफेसर देबोस्मिता पाल की हत्या के मामले में हर दिन नए खुलासे सामने आ रहे हैं। शुरुआती जांच जहां एक सुनियोजित हत्या की ओर इशारा कर रही थी, वहीं अब पुलिस की पड़ताल ने आरोपी रामप्रसाद दास की आपराधिक दुनिया के ऐसे राज खोले हैं, जिसने जांच एजेंसियों को भी चौंका दिया है।
करीब 1400 किलोमीटर दूर पश्चिम बंगाल के बर्धमान से दिल्ली आकर हत्या को अंजाम देने वाला रामप्रसाद दास केवल एक किरायेदार या संपत्ति विवाद में उलझा व्यक्ति नहीं था। जांच में सामने आया है कि वह लंबे समय से ठगी, फर्जी पहचान और धोखाधड़ी के नेटवर्क से जुड़ा हुआ था।
AI कैमरों ने किया बेनकाब
दिल्ली पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि आरोपी हत्या के दौरान और उसके बाद अपनी पहचान छिपाने में सफल दिखाई दे रहा था। पुलिस के अनुसार रामप्रसाद दास और उसकी पत्नी बनाश्री ने वारदात के दौरान मास्क पहन रखा था। हत्या के बाद दोनों ने अपने कपड़े भी बदल लिए ताकि उनकी पहचान न हो सके।
सोसायटी के गेट पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज में 3 जून को दोनों संदिग्ध मास्क पहने दिखाई दिए। जब यह फुटेज प्रोफेसर के भाई और बहन को दिखाई गई तो वे उन्हें पहचान नहीं सके।
यहीं से तकनीक ने जांच को नई दिशा दी।
डीसीपी राजीव कुमार के अनुसार जांच टीम में शामिल इंस्पेक्टर राजेश, एसआई अजय और स्पेशल स्टाफ के अधिकारियों को फुटेज के गहन विश्लेषण का जिम्मा सौंपा गया। AI आधारित कैमरा तकनीक की मदद से आरोपियों की आंखों, हाथों और बालों की तस्वीरों का विश्लेषण किया गया।
इन सूचनाओं को AI टूल पर अपलोड किया गया, जिसने संभावित वास्तविक चेहरा तैयार कर दिया। इसके बाद प्रोफेसर के परिजनों ने आरोपियों की पहचान की पुष्टि की और पुलिस ने मोबाइल लोकेशन तथा अन्य तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
हत्या से पहले दो बार की थी रेकी
पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपी दंपती ने हत्या से पहले दो बार प्रोफेसर के घर और आसपास के इलाके की रेकी की थी।
उन्होंने पूरे क्षेत्र की गतिविधियों, सुरक्षा व्यवस्था और आने-जाने के रास्तों का अध्ययन किया था। इससे स्पष्ट होता है कि हत्या अचानक नहीं बल्कि पूरी योजना और तैयारी के साथ की गई थी।

घर से मिला अपराध का खजाना
जब पुलिस ने पश्चिम बंगाल स्थित आरोपी के घर की तलाशी ली तो कई ऐसे सामान बरामद हुए जिन्होंने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया।
बरामद सामग्री में शामिल हैं:
- पश्चिम बंगाल पुलिस के नाम पर बने कई फर्जी पहचान पत्र
- पुलिस बैज और नकली पहचान दस्तावेज
- रेलवे टिकट चेकर (टीटीई) का नकली बैज
- नकली नोटों की गड्डियां
- लगभग 25 महंगी और ब्रांडेड घड़ियां
- 100 से अधिक महंगे शर्ट
- आरोपी के मोबाइल फोन में प्रोफेसर की कार की तस्वीरें
नकली नोटों की गड्डियों में ऊपर और नीचे असली नोट लगाए गए थे जबकि बीच में केवल सादा कागज रखा गया था। पुलिस को शक है कि इनका इस्तेमाल लोगों को ठगने के लिए किया जाता था।
दो करोड़ रुपये की ठगी का आरोप
जांच एजेंसियों के अनुसार दसवीं पास रामप्रसाद दास लंबे समय से लोगों को विभिन्न झांसे देकर पैसे ऐंठता था।
पुलिस का दावा है कि उसने करीब 50 लोगों से लगभग दो करोड़ रुपये की ठगी की है। वह लोगों से मोटी रकम उधार लेता और बाद में वापस नहीं करता था।
जांच में यह भी पता चला है कि उसने खुद को प्रभावशाली व्यक्ति बताकर कई लोगों का भरोसा जीता और फिर उन्हें आर्थिक नुकसान पहुंचाया।
संपत्ति विवाद बना हत्या की वजह
पुलिस के अनुसार हत्या के पीछे मुख्य कारण संपत्ति विवाद था।
सहायक प्रोफेसर देबोस्मिता पाल के पास करीब 1300 गज का एक मकान था जिसकी अनुमानित कीमत लगभग तीन करोड़ रुपये बताई जा रही है।
रामप्रसाद दास इस संपत्ति को खरीदने की इच्छा जाहिर कर रहा था। हालांकि प्रोफेसर को उस पर भरोसा नहीं था और उन्हें आशंका थी कि आरोपी संपत्ति पर अवैध कब्जा करने की कोशिश कर सकता है।
इसी वजह से उन्होंने आरोपी को स्पष्ट चेतावनी दी थी कि यदि वह एक सप्ताह के भीतर मकान खाली नहीं करता तो पुलिस में शिकायत की जाएगी।
पुलिस का मानना है कि इसी चेतावनी के बाद आरोपी ने हत्या की साजिश रची।

किरायेदार से हत्यारा बनने तक
जांच के अनुसार वर्ष 2023 में रामप्रसाद दास ने प्रोफेसर के मकान के दो कमरे पांच हजार रुपये मासिक किराए पर लिए थे।
बाद में लगभग डेढ़ वर्ष के भीतर उसने पूरा मकान 11 हजार रुपये प्रति माह किराए पर ले लिया।
वह सैनिटरी सामान के कारोबार से जुड़ा होने का दावा करता था और हर दो महीने में करोलबाग से सामान खरीदने दिल्ली आता-जाता था।
इसी दौरान उसने संपत्ति पर नजर जमाई और धीरे-धीरे पूरे मामले को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश की।
हत्या के बाद ऐसे भागे आरोपी
पुलिस के अनुसार हत्या के बाद आरोपी दंपती दिल्ली से ट्रेन के जनरल डिब्बे में बैठकर पश्चिम बंगाल पहुंचे।
बर्धमान स्टेशन पर उतरने के बाद दोनों लगभग एक किलोमीटर तक पैदल चले। इसके बाद उन्होंने सुनसान इलाके में खड़ी एक स्कूटी उठाई और अपने घर पहुंच गए।
फिलहाल दिल्ली पुलिस ने आरोपी रामप्रसाद दास और उसकी पत्नी बनाश्री को बर्धमान कोर्ट में पेश कर ट्रांजिट रिमांड हासिल कर लिया है। दोनों को दिल्ली लाया जा रहा है जहां उनसे आगे की पूछताछ की जाएगी।
उनके नाबालिग बेटे को बर्धमान स्थित बाल सुधार गृह भेज दिया गया है।
कई सवाल अभी बाकी
यह मामला अब केवल एक हत्या का नहीं रह गया है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि फर्जी पुलिस पहचान पत्र, नकली नोट और अन्य सामग्री का इस्तेमाल किन गतिविधियों में किया जाता था।
साथ ही यह भी जांच का विषय है कि क्या आरोपी किसी बड़े ठगी या फर्जीवाड़े के नेटवर्क का हिस्सा था या अकेले ही इन अपराधों को अंजाम देता था।
दिल्ली विश्वविद्यालय की एक सम्मानित प्रोफेसर की हत्या से शुरू हुई यह जांच अब संगठित ठगी, फर्जी पहचान और आपराधिक नेटवर्क के संभावित खुलासों तक पहुंच चुकी है।
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