ग्रेटर नोएडा स्थित शारदा यूनिवर्सिटी में विश्व थैलेसीमिया दिवस 2026 के अवसर पर हेमेटोलिम्फॉइड विकारों पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। देशभर के विशेषज्ञों ने थैलेसीमिया जैसी गंभीर आनुवंशिक बीमारी की रोकथाम, निदान और आधुनिक उपचार पर चर्चा की।
भारत में हर साल हजारों बच्चे एक ऐसी गंभीर बीमारी के साथ जन्म लेते हैं, जो उन्हें जीवनभर खून चढ़ाने पर मजबूर कर देती है। यह बीमारी है— थैलेसीमिया। विश्व थैलेसीमिया दिवस 2026 के अवसर पर ग्रेटर नोएडा स्थित शारदा यूनिवर्सिटी के शारदा स्कूल ऑफ मेडिकल साइंसेज़ एंड रिसर्च और शारदा हॉस्पिटल के पैथोलॉजी विभाग द्वारा हेमेटोलिम्फॉइड विकारों पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन और लाइव माइक्रोस्कोपी सत्र का आयोजन किया गया।
यह सम्मेलन इंडियन एसोसिएशन ऑफ पैथोलॉजिस्ट्स एंड माइक्रोबायोलॉजिस्ट्स (IAPM) के उत्तर प्रदेश चैप्टर, इंडियन कॉलेज ऑफ हेमेटोलॉजी (ICH) और इंडियन सोसाइटी ऑफ हेमेटोलॉजी एंड ब्लड ट्रांसफ्यूजन (ISHBT) के तत्वावधान में आयोजित किया गया।
क्या है थैलेसीमिया?
थैलेसीमिया एक आनुवंशिक रक्त विकार है, जिसमें शरीर में हीमोग्लोबिन का निर्माण सही तरीके से नहीं हो पाता। इससे मरीज को गंभीर एनीमिया हो जाता है और उसे नियमित रूप से ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत पड़ती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, थैलेसीमिया मेजर से पीड़ित बच्चों को अक्सर छह महीने की उम्र से ही रक्त चढ़ाने की आवश्यकता पड़ने लगती है। समय के साथ ये बच्चे विकास रुकने, हड्डियों में विकृति और शरीर में आयरन की अधिकता जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करते हैं।
देशभर से पहुंचे विशेषज्ञ और डॉक्टर
इस राष्ट्रीय सम्मेलन में देशभर के पैथोलॉजिस्ट, हेमेटोलॉजिस्ट, मेडिकल शिक्षक, शोधकर्ता और मेडिकल छात्र शामिल हुए। कार्यक्रम का उद्देश्य हेमेटोलिम्फॉइड रोगों के निदान, उपचार और नई तकनीकों को लेकर ज्ञान साझा करना था।

लाइव माइक्रोस्कोपी सत्र और केस-आधारित चर्चाओं के माध्यम से प्रतिभागियों को वास्तविक चिकित्सा मामलों और सटीक निदान की प्रक्रिया के बारे में व्यावहारिक जानकारी दी गई।
“यह सिर्फ बीमारी नहीं, राष्ट्रीय जिम्मेदारी है”
शारदा स्कूल ऑफ मेडिकल साइंसेज़ की डीन डॉ. निरुपमा गुप्ता ने कहा कि भारत में हर साल 10 हजार से अधिक बच्चे थैलेसीमिया मेजर के साथ जन्म लेते हैं। उन्होंने कहा कि यह केवल चिकित्सा चुनौती नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जिम्मेदारी भी है।
उन्होंने कहा,
“अगर समय रहते स्क्रीनिंग और जागरूकता बढ़ाई जाए तो हजारों परिवारों को जीवनभर के संघर्ष से बचाया जा सकता है।”
डॉ. गुप्ता ने जोर देकर कहा कि थैलेसीमिया की रोकथाम के लिए विवाह पूर्व और गर्भावस्था के दौरान जांच बेहद जरूरी है।
समय पर जांच और इलाज बेहद जरूरी
शारदा हॉस्पिटल के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. राम मूर्ति शर्मा ने कहा कि आनुवंशिक रक्त विकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि भारत में हर साल लगभग 10 से 15 हजार नए थैलेसीमिया मेजर के मामले सामने आते हैं। ऐसे में समय पर जांच और सही इलाज बेहद आवश्यक हो जाता है।
डॉ. शर्मा ने बताया कि नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन, कीलेशन थेरेपी और आधुनिक चिकित्सा देखभाल के जरिए थैलेसीमिया मरीज बेहतर और स्वस्थ जीवन जी सकते हैं।
उन्होंने कहा कि इस तरह के शैक्षणिक और वैज्ञानिक सम्मेलन चिकित्सा समुदाय के भीतर बेहतर इलाज पद्धतियों, अनुभव और ज्ञान को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाते हैं।

लाइव माइक्रोस्कोपी और केस स्टडी ने बढ़ाई रुचि
सम्मेलन के दौरान आयोजित लाइव माइक्रोस्कोपी सत्र प्रतिभागियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। विशेषज्ञों ने माइक्रोस्कोपिक तकनीकों के जरिए रक्त विकारों की पहचान और उनके विश्लेषण की प्रक्रिया को विस्तार से समझाया।
केस-आधारित चर्चाओं में कठिन मेडिकल मामलों पर चर्चा की गई, जिससे युवा डॉक्टरों और छात्रों को व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हुआ।
कई बड़े विशेषज्ञ रहे मौजूद
इस अवसर पर कई प्रतिष्ठित विशेषज्ञ और वरिष्ठ चिकित्सक मौजूद रहे। इनमें डॉ. अंशु गुप्ता देवरा, डॉ. सीमा गोयल, डॉ. वत्सला गुप्ता, डॉ. तेजस्विनी चौहान, डॉ. अतुल वर्मा, डॉ. तरुण मित्तल और डॉ. प्रीति जिंदल प्रमुख रूप से शामिल रहे।
इसके अलावा सफदरजंग हॉस्पिटल के डायरेक्टर प्रोफेसर डॉ. सूफीना ज़ाहिर और टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल मुंबई के प्रोफेसर डॉ. सुमीत गुजराल भी सम्मेलन में उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्ष, डॉक्टर, मेडिकल स्टाफ और बड़ी संख्या में मेडिकल छात्र भी शामिल हुए।
जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार
विशेषज्ञों का मानना है कि थैलेसीमिया जैसी बीमारियों से लड़ने का सबसे प्रभावी तरीका जागरूकता और समय पर जांच है। यदि विवाह पूर्व जांच को व्यापक स्तर पर लागू किया जाए तो भविष्य में इस बीमारी के मामलों को काफी हद तक रोका जा सकता है।
विश्व थैलेसीमिया दिवस के अवसर पर आयोजित यह सम्मेलन न केवल चिकित्सा जगत के लिए महत्वपूर्ण रहा, बल्कि समाज में जागरूकता बढ़ाने की दिशा में भी एक बड़ा कदम साबित हुआ।
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