Thursday, May 14, 2026

जब SGPGI के निदेशक ने छोड़ दी कार… साइकिल पर निकले प्रोफेसर धीमन का संदेश बना पूरे कैंपस में चर्चा का विषय

लखनऊ के एसजीपीजीआई में शुरू हुई नई पहल, निदेशक प्रो. राधा कृष्ण धीमन ने साइकिल से कार्यालय पहुंचकर दिया पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा बचत का बड़ा संदेश

Bahrampur , Latest Updated On - May 14 2026 | 13:20:00 PM
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संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (SGPGIMS) के निदेशक पद्मश्री प्रोफेसर राधा कृष्ण धीमन ने अपने आवास से कार्यालय तक साइकिल चलाकर सतत परिवहन और पर्यावरण संरक्षण की नई पहल की शुरुआत की। संस्थान अब परिसर में साइकिलिंग, पैदल आवागमन और कारपूलिंग को बढ़ावा देने की तैयारी में है।

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लखनऊ स्थित संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान में गुरुवार सुबह एक अलग ही दृश्य देखने को मिला। आम दिनों की तरह सरकारी वाहनों का काफिला नहीं, बल्कि संस्थान के निदेशक खुद साइकिल चलाते हुए अपने कार्यालय पहुंचे। यह दृश्य केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं था, बल्कि एक बड़े संदेश और नई सोच की शुरुआत बन गया।

संस्थान के निदेशक राधा कृष्ण धीमन ने अपने आवास से कार्यालय तक साइकिल चलाकर सतत परिवहन और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने की पहल का नेतृत्व किया। संस्थान प्रशासन ने इसे “ग्रीन कैंपस मूवमेंट” की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है।

एसजीपीजीआई के भीतर यह पहल अचानक चर्चा का विषय बन गई। कर्मचारियों, रेजिडेंट डॉक्टरों और छात्रों के बीच यह संदेश तेजी से फैल गया कि जब संस्थान का सर्वोच्च अधिकारी खुद साइकिल से दफ्तर पहुंच सकता है, तो आम लोगों को भी अपनी जीवनशैली में बदलाव लाने पर विचार करना चाहिए।


यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब देशभर में ऊर्जा संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और सतत विकास को लेकर लगातार जागरूकता बढ़ाई जा रही है। संस्थान ने स्पष्ट किया कि यह कदम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उस अपील के अनुरूप है, जिसमें नागरिकों और सरकारी कर्मचारियों से पेट्रोल और डीजल की खपत कम करने के लिए सार्वजनिक परिवहन, कारपूलिंग, साइकिलिंग और पैदल चलने को अपनाने का आग्रह किया गया था।

प्रोफेसर धीमन ने इस अवसर पर कहा कि यह केवल प्रतीकात्मक पहल नहीं है, बल्कि आने वाले समय में संस्थान की कार्य संस्कृति का हिस्सा बनने जा रही है। उन्होंने बताया कि पहले चरण में संस्थान के संकाय सदस्यों, रेजिडेंट डॉक्टरों, कर्मचारियों और छात्रों को परिसर के अंदर और आसपास अनावश्यक वाहन उपयोग से बचने के लिए प्रेरित किया जाएगा।

उन्होंने विशेष रूप से उन कर्मचारियों से अपील की जो परिसर से तीन से चार किलोमीटर की दूरी पर रहते हैं। उनका कहना था कि इतने कम दायरे में मोटर वाहनों का इस्तेमाल न केवल ईंधन की खपत बढ़ाता है, बल्कि पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। ऐसे लोगों को पैदल चलने या साइकिल से आने की आदत विकसित करनी चाहिए।

संस्थान अब इस पहल को स्थायी रूप देने की तैयारी में भी जुट गया है। प्रशासन ने परिसर के प्रमुख स्थानों पर सात से आठ नए साइकिल स्टैंड स्थापित करने की योजना बनाई है। माना जा रहा है कि इससे छात्रों और कर्मचारियों को साइकिल उपयोग के लिए बेहतर सुविधा मिल सकेगी।


प्रोफेसर धीमन ने कहा कि वाहनों पर निर्भरता कम करना केवल ईंधन बचत का मामला नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ वातावरण तैयार करने की जिम्मेदारी भी है। उन्होंने कहा कि साइकिल चलाना और पैदल चलना लोगों के शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक तंदुरुस्ती और जीवनशैली में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।

उन्होंने कर्मचारियों को कारपूलिंग अपनाने की भी सलाह दी। उनका मानना है कि यदि एक ही दिशा में जाने वाले लोग एक साथ वाहन का उपयोग करें, तो इससे न केवल परिसर में वाहनों की संख्या कम होगी बल्कि ट्रैफिक जाम और पार्किंग की समस्या पर भी नियंत्रण पाया जा सकेगा।

एसजीपीजीआई को लंबे समय से उसके हरित वातावरण और जैव विविधता के लिए जाना जाता रहा है। संस्थान परिसर में बड़ी संख्या में पेड़-पौधे, हरियाली और प्राकृतिक वातावरण मौजूद है। प्रोफेसर धीमन ने इसे “ग्रीन कैंपस” बताते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण संस्थान की पहचान और जिम्मेदारी दोनों है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक परिस्थितियों में सुधार नहीं होता, तब तक वे स्वयं साइकिल से ही आवागमन जारी रखेंगे। उनके इस बयान को संस्थान के भीतर नेतृत्व और व्यक्तिगत जिम्मेदारी के मजबूत संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बड़े संस्थान और सरकारी कार्यालय इस तरह की पहल को गंभीरता से लागू करें, तो इससे शहरी प्रदूषण और ईंधन खपत में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। साथ ही यह लोगों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए भी प्रेरित करेगा।

फिलहाल एसजीपीजीआई में शुरू हुई यह पहल केवल एक संस्थान तक सीमित नहीं दिख रही, बल्कि यह पूरे प्रदेश के सरकारी और शैक्षणिक संस्थानों के लिए एक उदाहरण बन सकती है।

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