ईरान-इजरायल-अमेरिका संघर्ष के बीच बढ़ती कच्चे तेल की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए अमेरिका ने रूसी तेल पर अपनी सख्ती कुछ हद तक कम कर दी है। भारत को पहले दी गई छूट के बाद अब अन्य देशों को भी अस्थायी तौर पर रूसी तेल खरीदने की अनुमति दी गई है।
पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच लगातार तेज हो रहे संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है। इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अमेरिका ने अपनी ऊर्जा नीति में अस्थायी नरमी दिखाते हुए कई देशों को रूसी तेल खरीदने की अनुमति देने का फैसला किया है।
अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने गुरुवार को इस संबंध में जानकारी देते हुए कहा कि बढ़ती तेल कीमतों को नियंत्रित करने और वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया गया है। इससे पहले अमेरिका भारत को भी रूस से तेल खरीदने के लिए 30 दिनों की अस्थायी अनुमति दे चुका है।
दरअसल, यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने रूस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे और दुनिया के अन्य देशों से भी रूसी तेल न खरीदने की अपील की थी। हालांकि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों और ऊर्जा संकट की आशंका को देखते हुए अमेरिका को अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ा है।

न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, स्कॉट बेसेंट ने कहा कि ईरान से जुड़ा संघर्ष जल्द खत्म होने के संकेत नहीं दिख रहे हैं। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी की आशंका बनी हुई है। इसी को ध्यान में रखते हुए ट्रंप प्रशासन ने समुद्र में फंसे रूसी तेल को खरीदने के लिए अन्य देशों को अस्थायी अनुमति देने का फैसला किया है।
स्कॉट बेसेंट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठा रहे हैं। उन्होंने कहा कि आतंकवादी ईरानी शासन से उत्पन्न खतरे और अस्थिरता के बीच तेल की कीमतों को नियंत्रित रखना जरूरी है।
उन्होंने आगे कहा, “मौजूदा सप्लाई की वैश्विक पहुंच बढ़ाने के लिए अमेरिका अन्य देशों को समुद्र में फंसे रूसी तेल को खरीदने की अस्थायी अनुमति दे रहा है। यह विशेष रूप से एक शॉर्ट-टर्म उपाय है और केवल उस तेल पर लागू होगा जो पहले से समुद्र में परिवहन के दौरान है।”
स्कॉट बेसेंट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस व्यवस्था से रूसी सरकार को कोई बड़ा आर्थिक फायदा नहीं होगा, क्योंकि यह केवल पहले से शिपमेंट में मौजूद तेल तक सीमित है। उन्होंने कहा कि अमेरिका की ऊर्जा नीतियों की वजह से देश में तेल और गैस का उत्पादन रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया है, जिससे अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए ईंधन की कीमतें कम रखने में मदद मिली है।
उन्होंने कहा कि तेल की कीमतों में मौजूदा बढ़ोतरी अस्थायी है और यह केवल अल्पकालिक व्यवधान है। लंबे समय में इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था को लाभ मिलने की उम्मीद है।

गौरतलब है कि अमेरिका ने 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने के बाद से बढ़ रही तेल की कीमतों को कम करने की कोशिशों के तहत भारत को भी रूसी तेल खरीदने की अस्थायी छूट दी थी। इसका औपचारिक ऐलान 5 मार्च को किया गया था।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर केवल युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं है। जैसे-जैसे यह संघर्ष लंबा खिंचता जा रहा है, इसका असर दुनिया के उन देशों पर भी पड़ने लगा है जो हजारों किलोमीटर दूर स्थित हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते सैन्य टकराव ने पूरे पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक माहौल को प्रभावित कर दिया है।
इसका सीधा असर खाड़ी देशों के तेल उत्पादन और आपूर्ति पर भी पड़ सकता है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक जारी रहती है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और बढ़ सकती है, जिससे तेल और गैस की कीमतों में और उछाल देखने को मिल सकता है।
फिलहाल अमेरिका की ओर से उठाया गया यह कदम अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने की दिशा में एक अस्थायी प्रयास माना जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया का यह संघर्ष जितना लंबा चलेगा, उसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर उतना ही गहरा होगा।
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