अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने मध्य पूर्व को युद्ध के बेहद करीब ला दिया था। आखिरी वक्त पर सऊदी अरब, कतर और ओमान की कूटनीतिक पहल से हालात संभल सके और डोनाल्ड ट्रंप ने सैन्य हमला टाल दिया।
मध्य पूर्व एक बार फिर गंभीर युद्ध संकट के मुहाने पर पहुंच गया था। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने पूरे खाड़ी क्षेत्र को हाई अलर्ट पर ला दिया था। हालात इतने बिगड़ चुके थे कि किसी भी समय सैन्य टकराव शुरू हो सकता था। इसी नाजुक घड़ी में सऊदी अरब, कतर और ओमान ने सक्रिय कूटनीतिक हस्तक्षेप कर युद्ध की आशंका को टाल दिया।
खाड़ी देशों के अधिकारियों के अनुसार, गुरुवार (15 जनवरी 2026) को अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर था। सऊदी अरब, कतर और ओमान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से लगातार संपर्क कर उन्हें समझाया कि ईरान को अपनी नीयत स्पष्ट करने का एक अंतिम मौका दिया जाना चाहिए। इसे आखिरी समय की निर्णायक कूटनीतिक जद्दोजहद बताया गया।

अमेरिका ने ईरान में जारी विरोध प्रदर्शनों और कथित दमन को लेकर सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दी थी। जवाब में ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और युद्धपोतों पर पलटवार की धमकी दी। हालात की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अमेरिका को कतर स्थित अल-उदेद एयरबेस—मध्य पूर्व में उसके सबसे बड़े सैन्य अड्डे—से अपने सैन्य कर्मियों को अस्थायी रूप से हटाना पड़ा।
AFP की रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अमेरिका को चेताया कि ईरान पर हमला पूरे क्षेत्र को युद्ध की आग में झोंक सकता है। साथ ही खाड़ी देशों ने ईरान को भी साफ संदेश दिया कि अमेरिकी ठिकानों पर हमला होने की स्थिति में उसके क्षेत्रीय संबंध स्थायी रूप से खराब हो जाएंगे।
खाड़ी देशों के दबाव और ईरान से मिले आश्वासन के बाद अमेरिका को भरोसा मिला कि प्रदर्शनकारियों को फांसी नहीं दी जाएगी। इसके बाद डोनाल्ड ट्रंप ने तत्काल सैन्य कार्रवाई टालने का फैसला किया। फिलहाल संकट टल गया है, लेकिन खाड़ी देशों का कहना है कि मध्य पूर्व में स्थायी शांति के लिए बातचीत जारी रहेगी।
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