जेवर विधायक धीरेंद्र सिंह ने नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण क्षेत्रों में भूमि दरों में भारी वृद्धि के बावजूद किसानों के मुआवज़े, सर्किल रेट और पुनर्वास लाभों में वृद्धि न होने पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने प्राधिकरणों और प्रशासन को पत्र लिखकर किसानों के हित में तत्काल निर्णय लेने की मांग की है।
नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण क्षेत्र में तेजी से बढ़ती जमीनों की कीमतों के बीच किसानों के मुआवज़े और सर्किल रेट को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। जेवर से विधायक धीरेंद्र सिंह ने इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाते हुए प्राधिकरणों और प्रशासनिक संस्थाओं पर किसानों की अनदेखी करने का आरोप लगाया है।
विधायक धीरेंद्र सिंह ने कहा कि पिछले चार वर्षों में आवासीय और औद्योगिक भूखंडों की कीमतों में रिकॉर्ड वृद्धि हुई है, लेकिन जिन किसानों ने अपनी जमीन विकास परियोजनाओं के लिए दी, उन्हें अब भी पुराने और कम दरों पर मुआवज़ा दिया जा रहा है। उन्होंने इसे सामाजिक और आर्थिक न्याय के खिलाफ बताते हुए तत्काल सुधार की मांग की है।
“भूमि का बाजार मूल्य बढ़ा, लेकिन किसान पीछे क्यों?”
जेवर विधायक ने अपने विस्तृत पत्र में उल्लेख किया कि पिछले लगभग चार वर्षों में आवासीय भूखंडों की दरों में करीब 53 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है, जबकि औद्योगिक भूखंडों की कीमतों में लगभग 63 प्रतिशत तक इजाफा दर्ज किया गया है। उनका कहना है कि यह स्पष्ट संकेत है कि क्षेत्र की भूमि का वास्तविक बाजार मूल्य लगातार बढ़ रहा है।

धीरेंद्र सिंह ने सवाल उठाया कि जब प्राधिकरण बाजार के अनुसार भूखंडों की कीमतें बढ़ाकर राजस्व अर्जित कर रहे हैं, तब किसानों को पुराने मुआवज़े की दरों पर भुगतान करना कैसे उचित माना जा सकता है?
उन्होंने कहा कि “किसानों को पुराने सर्किल रेट और कम मुआवज़े पर सीमित रखना न्याय की मूल भावना के खिलाफ है। जिन किसानों ने अपनी पुश्तैनी जमीन देकर विकास की नींव रखी, उन्हें उचित भागीदारी और सम्मान मिलना चाहिए।”
विकास का लाभ किसानों तक पहुंचना जरूरी
विधायक धीरेंद्र सिंह ने कहा कि नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण क्षेत्र देश के सबसे तेजी से विकसित होने वाले क्षेत्रों में शामिल हैं। यहां बड़े उद्योग, एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट और आवासीय परियोजनाएं विकसित हो रही हैं। लेकिन इस विकास का वास्तविक आधार वे किसान हैं, जिन्होंने अपनी जमीन देकर इन परियोजनाओं को संभव बनाया।

उन्होंने कहा कि विकास का लाभ केवल प्राधिकरणों, उद्योगपतियों और निवेशकों तक सीमित नहीं रह सकता। किसानों को भी इस विकास में समान भागीदारी मिलनी चाहिए।
विधायक ने कहा कि यदि किसान अपनी जमीन नहीं देते, तो न उद्योग स्थापित होते और न ही क्षेत्र में इतना बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा हो पाता। इसलिए किसानों को उचित मुआवज़ा और पुनर्वास लाभ देना सरकार और प्राधिकरणों की नैतिक जिम्मेदारी है।
अदालतों के फैसलों का भी दिया हवाला
धीरेंद्र सिंह ने अपने पत्र में सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों के फैसलों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि न्यायालयों ने कई बार स्पष्ट किया है कि भूमि अधिग्रहण केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि पारदर्शिता, समान भागीदारी और न्यायसंगत मुआवज़े का विषय है।
उन्होंने कहा कि भूमि अधिग्रहण के मामलों में किसानों के अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि बाजार मूल्य बढ़ रहा है तो उसका लाभ किसानों को भी मिलना चाहिए।

“प्राधिकरण केवल राजस्व कमाने की संस्था नहीं”
जेवर विधायक ने प्रशासनिक संस्थाओं की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि प्राधिकरणों की भूमिका केवल राजस्व अर्जित करने तक सीमित नहीं हो सकती।
धीरेंद्र सिंह ने कहा, “शासन और प्रशासन का मूल दायित्व किसानों और आम नागरिकों के हितों की रक्षा करना है। यदि प्राधिकरण उद्योगों और निवेशकों को प्रोत्साहन दे सकते हैं, तो किसानों के वैध अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।”
उन्होंने कहा कि किसानों के लंबित मामलों को बार-बार शासन के पास भेजना समस्या का समाधान नहीं है। प्राधिकरण स्वयं एक स्वायत्तशासी संस्था हैं और उनके पास नीतिगत निर्णय लेने का अधिकार मौजूद है। ऐसे में किसानों के मामलों में अनावश्यक देरी उचित नहीं है।
“विकास तभी सार्थक जब किसान सम्मानित हों”
धीरेंद्र सिंह ने कहा कि विकास तभी सफल और सार्थक माना जाएगा, जब उसकी आधारशिला रखने वाले किसानों को भी न्याय, सम्मान और उचित भागीदारी मिले।
उन्होंने शासन और संबंधित प्राधिकरणों से मांग की कि किसानों के मुआवज़े, सर्किल रेट और पुनर्वास लाभों की नई दरें तत्काल प्रभाव से लागू की जाएं। साथ ही किसानों के लंबित मामलों का शीघ्र समाधान सुनिश्चित किया जाए।
विधायक ने अपने पत्र में इस विषय को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की मांग करते हुए कहा कि यदि किसानों के हितों की अनदेखी जारी रही, तो यह सामाजिक असंतोष का बड़ा कारण बन सकता है।
अब देखना होगा कि शासन और प्राधिकरण इस मांग पर क्या निर्णय लेते हैं और क्या तेजी से बढ़ते नोएडा-जेवर विकास मॉडल में किसानों को भी उनकी अपेक्षित हिस्सेदारी मिल पाती है या नहीं।
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