लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बोलने से रोके जाने पर तीखा टकराव हुआ। बाद में बाहर आकर उन्होंने पीएम मोदी पर दबाव, ट्रेड डील और राष्ट्रीय हितों से समझौते के आरोप लगाए।
लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान मंगलवार को उस वक्त तीखा राजनीतिक टकराव देखने को मिला, जब नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बोलने से रोके जाने पर सदन में लगातार व्यवधान हुआ। राहुल गांधी एक ऐसे लेख का हवाला देकर राष्ट्रीय सुरक्षा, चीन-पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध और प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया पर बात करना चाहते थे, जिसे उन्होंने सदन में “ऑथेंटिकेट” भी किया। बावजूद इसके, उन्हें अपनी बात पूरी रखने का अवसर नहीं मिला।

राहुल गांधी ने सदन में कहा कि राष्ट्रपति के अभिभाषण में राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक राजनीति, खासकर चीन-अमेरिका संघर्ष, बेहद अहम विषय हैं। उन्होंने पूर्वी लद्दाख में हुए संघर्ष और उसमें शहीद हुए भारतीय सैनिकों का जिक्र करते हुए सवाल उठाने की कोशिश की। इसी दौरान अनुमति को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक हुई। राहुल गांधी ने “अनुमति” शब्द पर आपत्ति जताते हुए कहा कि नेता प्रतिपक्ष के रूप में बोलना उनका अधिकार है।

सदन से बाहर आकर राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि इतिहास में पहली बार राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान एलओपी को बोलने नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी “भयंकर दबाव” में हैं और इसी दबाव में अमेरिका के साथ लंबित ट्रेड डील पर हस्ताक्षर किए गए। राहुल गांधी का दावा था कि इस डील में किसानों की मेहनत और हितों से समझौता किया गया है।
उन्होंने आगे कहा कि प्रधानमंत्री पर दो बड़े दबाव बिंदु हैं—एक अमेरिका में अडानी से जुड़ा मामला, जिसे उन्होंने भाजपा और प्रधानमंत्री के वित्तीय ढांचे से जोड़ा, और दूसरा “एपस्टीन फाइल्स”, जिनके और खुलासे अभी सामने आना बाकी हैं। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि इन्हीं कारणों से प्रधानमंत्री “कॉम्प्रोमाइज्ड” हैं और सरकार सच्चाई सामने आने से डर रही है।
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